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गोपाल पाठा : एक निडर स्वतंत्रता सेनानी की कहानी

rahul
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जैसे ही बेंगल फाइल्स रिलीज हुआ सभी सोशल मिडिया, विकिपीडिआ प्लेटफोर्म पर एक ही नाम सर्च हो रहा है वो है हिन्दूओं के मसीहा गोपाल पाठा आखिर कौन है गोपाल क्यों बेंगल फाइल्स में मुख्य किरदार में है आइये जानते है

भारत की आज़ादी की लड़ाई में अनेक गुमनाम नायक सामने आए, जिन्होंने अपने साहस और बलिदान से स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। इन्हीं में से एक नाम है गोपाल पाठा का, जिन्हें कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) के लोग आज भी याद करते हैं। आज कोलकाता में हिन्दू सर उठाके जी रहे है उसका सम्पूर्ण श्रेय गोपाल पाठा को जाता  है , परन्तु  आजादी के बाद तत्कालीन सरकार ने उन्हें गुंडा कहकर गुमनामी के अँधेरे में धकेल दिया गया |



गोपाल पाठा (1907 – 1994) का असली नाम गोपाल मुखर्जी था। वे कोलकाता के बेहरीटाला लेन में रहते थे उनका जन्म एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ और पेशे से मांस विक्रेता बंगाली में बकरे के मांस को पाठा कहा जाता है इसी बजह से उन्हें "पाठा" नाम से जाना जाने लगा।

उनकी पहचान केवल मांस व्यापारी तक सीमित नहीं थी। वे अपने मजबूत शरीर, निडर स्वभाव और साहसी कार्यों के लिए पूरे कोलकाता में प्रसिद्ध थे।

1946 में जिन्ना के आदेश पर डायरेक्ट एक्शन डे (Direct Action Day) के दौरान कोलकाता में सांप्रदायिक दंगे भड़के, लगातार 4 दिन तक 10000 हिन्दुओ का कत्लेआम किया गया यह सब देखकर गोपाल पाठा ने अपने इलाके की रक्षा के लिए स्वयंसेवकों की एक टीम तैयार की। उन्होंने स्थानीय युवाओं को संगठित कर आत्मरक्षा दल बनाया। उनका दल दंगाइयों का डटकर मुकाबला करता था और मासूम नागरिकों की रक्षा करता था। उनका कहना था की वो यदि एक मारे तो हम 10 मारेंगे |


कई बार उनके साहस और रणनीति ने पूरे इलाके को हिंसा से बचा लिया। इस वजह से गोपाल पाठा स्थानीय जनता के लिए रक्षक और हीरो बन गए।  तत्कालीन समय गाँधी जी ने गोपाल पाठा से मिलने के लिए कई बार सुचना भिजबाई परन्तु वे नहीं गए अंत जब मिले तो गाँधी जी के अहिंसा के पथ पर चलने से इंकार कलर दिए उन्होंने गाँधी जी के अहिंसा का बहुत बिरोध किया |

गोपाल पाठा का शरीर बेहद मजबूत और कद-काठी प्रभावशाली थी। वे खुले विचारों के व्यक्ति थे और हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों में उनका सम्मान था। उनके बारे में कहा जाता है कि वे अन्याय को सहन नहीं करते थे और तुरंत न्याय करने के लिए खड़े हो जाते थे।

आजादी के बाद भी गोपाल पाठा कोलकाता में एक सम्मानित व्यक्ति के रूप में जाने जाते रहे। उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई, लेकिन समाज सेवा और अपने इलाके की रक्षा करना जारी रखा। 1994 में उनका निधन हो गया।



हम सभी हिदुओ को यह फिल्म देखना चाहिए और सभी को प्रेरित करना चाहिए | ताकि हम जान सके की हमसे इतिहास क्यों छुपाया गया |

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