कृषि
विज्ञान केंद्र, गोविंदनगर, नर्मदापुरम में फसल अवशेष प्रबंधन विषय
पर आयोजित पाँच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम नोडल अधिकारी डॉ. राजेन्द्र पटेल के
मार्गदर्शन में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य किसानों को
फसल अवशेषों के वैज्ञानिक एवं पर्यावरण अनुकूल प्रबंधन की उन्नत तकनीकों से अवगत
कराना तथा इनके प्रभावी उपयोग के माध्यम से कृषि लागत में कमी लाने, मृदा
स्वास्थ्य में सुधार करने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए प्रेरित करना रहा।
प्रशिक्षण
के दौरान प्रतिभागियों को सैद्धांतिक कक्षाओं के साथ-साथ प्रायोगिक प्रशिक्षण भी
प्रदान किया गया। विशेषज्ञों ने फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन की आवश्यकता बताते
हुए कहा कि फसल कटाई के बाद खेतों में बची नरवाई एवं अन्य अवशेषों को जलाना मिट्टी, पर्यावरण
और कृषि उत्पादन के लिए नुकसानदायक है। नरवाई जलाने से मिट्टी में मौजूद लाभकारी
सूक्ष्मजीव प्रभावित होते हैं, जैविक पदार्थों की हानि होती है तथा
वायु प्रदूषण बढ़ता है। इसके विपरीत,
फसल अवशेषों का वैज्ञानिक प्रबंधन
मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाता है।
प्रशिक्षण
में सुपर सीडर,
हैप्पी सीडर, मल्चर
एवं अन्य कृषि यंत्रों
के माध्यम से फसल अवशेष प्रबंधन की
तकनीकों की जानकारी दी गई। प्रतिभागियों को बताया गया कि आधुनिक कृषि यंत्रों की
सहायता से अवशेषों को खेत में ही व्यवस्थित करके अगली फसल की बुवाई की जा सकती है।
इससे अवशेषों के निपटान की समस्या कम होती है और समय, श्रम
तथा उत्पादन लागत की बचत में मदद मिलती है।
कार्यक्रम
के दौरान फसल अवशेषों से जैविक खाद तैयार करने,
कम्पोस्ट निर्माण, मल्चिंग
तथा अवशेषों को खेत में मिलाकर मृदा में जैविक कार्बन बढ़ाने जैसी उपयोगी तकनीकों
पर भी विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने बताया कि फसल अवशेषों का उचित उपयोग
मिट्टी की जलधारण क्षमता में सुधार,
नमी संरक्षण, खरपतवार
नियंत्रण तथा मृदा संरचना को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है। इससे किसानों को
रासायनिक आदानों पर होने वाले अनावश्यक व्यय को कम करने और प्राकृतिक संसाधनों का
बेहतर उपयोग करने का अवसर मिलता है।
कृषि
विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉ. संजीव कुमार गर्ग ने प्रतिभागियों को संबोधित करते
हुए फसल अवशेष प्रबंधन को वर्तमान कृषि व्यवस्था की महत्वपूर्ण आवश्यकता बताया।
उन्होंने कहा कि किसानों को नरवाई जलाने के बजाय उपलब्ध संसाधनों और स्थानीय
परिस्थितियों के अनुसार वैज्ञानिक विकल्प अपनाने चाहिए। फसल अवशेषों का समुचित
उपयोग करके मिट्टी की सेहत को सुरक्षित रखा जा सकता है तथा कृषि उत्पादन प्रणाली
को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है।
केंद्र
के प्रभारी डॉ. ब्रजेश कुमार नामदेव ने भी किसानों को मार्गदर्शन प्रदान किया।
उन्होंने फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन,
पर्यावरण संरक्षण तथा कृषि में
वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाने के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रतिभागियों को
प्रशिक्षण में प्राप्त जानकारी का उपयोग अपने खेतों में करने और अन्य किसानों को
भी नरवाई न जलाने के लिए जागरूक करने हेतु प्रेरित किया।
प्रशिक्षण
के नोडल अधिकारी डॉ. राजेन्द्र पटेल ने कार्यक्रम के दौरान फसल अवशेषों को समस्या
के बजाय उपयोगी कृषि संसाधन के रूप में देखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने
बताया कि उपलब्ध अवशेषों का सही प्रबंधन करके खेत की उत्पादकता बनाए रखने, कृषि
लागत कम करने और अतिरिक्त आर्थिक लाभ की संभावनाओं को बढ़ाया जा सकता है। इस दिशा
में कृषि यंत्रों के उपयोग, जैविक खाद निर्माण और मल्चिंग जैसी तकनीकों को अपनाना किसानों
के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
प्रशिक्षण
के समापन पर प्रतिभागियों को फसल अवशेष प्रबंधन की उन्नत तकनीकों को अपनाने, नरवाई
जलाने से बचने, मृदा एवं पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देने तथा अन्य
किसानों तक वैज्ञानिक जानकारी पहुँचाने के लिए प्रेरित किया गया।
कृषि
विज्ञान केंद्र, गोविंदनगर का यह प्रशिक्षण किसानों में फसल अवशेषों के बेहतर
उपयोग के प्रति जागरूकता बढ़ाने तथा
लागत में कमी, अतिरिक्त
आय के अवसर और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करने की
दिशा में महत्वपूर्ण पहल रहा।

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